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कितना कुछ घटित हो रहा है हमारे सामने आज कल.. हम सब कहीं न कहीं इस घटने में शामिल होते हैं.. प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष ही... हम विकास कर रहे हैं किन्तु असंवेदनशील होकर? दया, त्याग, सहिष्णुता, संवेदनशीलता को ताक पर रख कर....
सुनो, बरसों बाद कल को अगर  मैं दिखा जाऊं कहीं किसी मोड़ पर तुम्हारी तरफ आता हुआ... तो मुझे आवाज न देना.... चले जाना मुझसे नजर फेर कर  कौन जाने तुम्हारी आवाज सुनकर  तुम्हे अपने इतने करीब देखकर  कदमों के साथ धड़कन भी  रूक जाए, थम जाए, रह जाए ठहर कर....