नमस्कार भाई साब!
अक्सर कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के चले जाने से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह सबसे बड़ा झूठ है। फर्क पड़ता है, पूरी दुनिया को भले न फर्क पड़े उसे तो ज़रूर फर्क पड़ता है जिसके लिए जाने वाला व्यक्ति दुनिया में बहुत कीमती होता है। पिछले साल १६ अक्टूबर को मेरे ‘शत्रु मित्र ’ (ऐसा संबोधन वही करते थे मेरे लिए) श्री अमीरचंद जी इस दुनिया से विदा हुए थे। आज ये लिखते हुए भी मेरी आँख नम हो गयी है। इस साल उनकी पहली पुण्यतिथि है १६ अक्टूबर को उनके पैतृक निवास स्थान बलिया में। मेरी पूरी तैयारी और चाह थी वहां जाने की। आठ तारीख़ को मैंने टिकट कटा भी रखी थी मुंबई से आज़मगढ़ की। चूँकि दस तारीख को मुख्य राजस्व अधिकारी की अदालत में मेरी एक जमीन के मुक़दमे की तारीख भी थी। तैयारी यह थी कि दस को अपनी तारीख निपटा कर बनारस चला जाऊँगा और १४ को वहां से बलिया के लिए रवानगी और फिर १६ को कार्यक्रम के बाद कहीं घुमने निकल जाता। लेकिन अफ़सोस चाहा कभी होता ही नहीं मेरा। १५ को एक वेब सीरीज जो मैं लिख रहा हूँ उसकी नरेशन के लिए वड़ोदरा जाना पड़ेगा। मन दुखी हुआ लेकिन फिर अमीरचंद...