अन्धविश्वास (लघु कथा)
अन्धविश्वास (लघु कथा) ट्रेन से सफ़र के दौरान मेरी ट्रेन तुम्हारे शहर में रुकी। रात के डेढ़ बज रहे थे। तुम्हारे शहर का तापमान एक डिग्री था उस दिन। मुझे तुम्हारे शहर में पहुँचने के डेढ़ सौ किमी पहले से ही उत्सुकता और बेचैनी होने लगी थी। आँख की नींद तुम्हारे शहर को जोह रही थी। मेरे अलावा डब्बे में कोई नहीं जाग रहा था। जाग रहे भी होंगे तो जागे जैसे नहीं थे। ट्रेन तुम्हारे शहर के प्लेटफार्म पर रुकी और चहल पहल भी एकदम नाम की थी। शाल, स्वेटर जैकेट में लिपटे बदन और मफलर, टोपियों से ढंके एक्का दुक्का चेहरे प्लेटफार्म पर टहलते दिखे। मेरी बोगी में से कोई नहीं लेकिन मेरी आगे की बोगी से कुछ लोग उतर कर बाहर निकले जरुर दिखे मुझे। मैंने खिड़की से बाहर झाँक कर बोर्ड पर तुम्हारे शहर का नाम पढ़ा और आँख भर आई। ये कितना अजीब है कि यदि हम किसी से प्यार करते हैं तो उसका शहर, उसकी गलियां, उससे जुडी हर चीज ही पसंद करने लगते हैं और जब अलग हो जाते हैं तो न वो शख्स वैसा लगता है न उससे जुड़ी कोई बात भली लगती है। हालाँकि मुझे कभी किसी के साथ अलग होने से कोई बुरा लगा नहीं। मेरी भावनाएं जैसी साथ रहते होती थ...