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  क्यूट लिट्टी चोखा की कहानी! कुछ दिन पहले एक कैफ़े में जाना हुआ। बड़ा ही एथेनिक और कूल वाईब था। अंदर सफ़ेद रंग का ज्यादा इस्तेमाल था। मैं बहुत रेस्तरां में जाने वाला आदमी वैसे भी नहीं हूँ, मुझे देशी चीजें ही ज्यादा लुभाती हैं और घर का खाना ही ज्यादा पसंद करता हूँ। मैंने मेनू देखा उसमें पास्ता, पिज़्ज़ा और इसके अलावा बहुत सी इसी टाइप्स की डिश थीं। मैं पहले उनके नाम पढ़ता और फिर उसके नीचे उनकी डिटेल्डिस कि उसमें क्या-क्या है? मैं क्या आर्डर करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर अचानक से मेरी नज़र लिट्टी-चोखा पर पड़ी। मुझे उस वक्त वैसी ही ख़ुशी मिली जैसी ख़ुशी मिली जैसी ख़ुशी मैडम क्युरी को रेडियम के अविष्कार करने पर हुई होगी। मैंने बिना सोचे समझे लिट्टी चोखा बोल दिया लाने को। अब लिट्टी चोखा को लेकर मेरे मन में एक पारंपरिक इमेज ही बनी हुई है कि लिट्टी ऐसी होती है, खासकर के उसके आकार को लेकर। लिट्टी का एक मध्यम आकार ही कल्पना में होता है। हालाँकि एक बार बलिया में Ajit Singh भईया के गाँव में गोल नहीं लम्बे आकार में लिट्टी मिली तो वो भी अचरज लगा। उस आकार में लिट्टी उसके बाद कहीं भी नहीं देखा। लिट्ट...
'जब तक जीना है खटना-कमाना है और क्या है जीवन में? आज मम्मी ने ये बात किसी बात के सन्दर्भ में कही। ये एक लाइन मन में अटकी रह गयी है। मैं सोच रहा हूँ कि कितनी सहजता से मम्मी ने इतनी बड़ी बात कह दी। इतनी बड़ी बातें सहजता से ही आती हैं मन में। इस एक लाइन में माँ के वृहद् जीवन अनुभव का सार है।      मैं तब से सोच ही रहा हूँ कि आखिर क्या ही है जीवन में कमाना-खटना । धीरे-धीरे जैसे ये समय बीत रहा है मैं इस बात को बहुत अच्छे से समझ रहा हूँ और  

अन्धविश्वास (लघु कथा)

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  अन्धविश्वास (लघु कथा) ट्रेन से सफ़र के दौरान मेरी ट्रेन तुम्हारे शहर में रुकी। रात के डेढ़ बज रहे थे। तुम्हारे शहर का तापमान एक डिग्री था उस दिन। मुझे तुम्हारे शहर में पहुँचने के डेढ़ सौ किमी पहले से ही उत्सुकता और बेचैनी होने लगी थी। आँख की नींद तुम्हारे शहर को जोह रही थी। मेरे अलावा डब्बे में कोई नहीं जाग रहा था। जाग रहे भी होंगे तो जागे जैसे नहीं थे। ट्रेन तुम्हारे शहर के प्लेटफार्म पर रुकी और चहल पहल भी एकदम नाम की थी। शाल, स्वेटर जैकेट में लिपटे बदन और मफलर, टोपियों से ढंके एक्का दुक्का चेहरे प्लेटफार्म पर टहलते दिखे। मेरी बोगी में से कोई नहीं लेकिन मेरी आगे की बोगी से कुछ लोग उतर कर बाहर निकले जरुर दिखे मुझे। मैंने खिड़की से बाहर झाँक कर बोर्ड पर तुम्हारे शहर का नाम पढ़ा और आँख भर आई। ये कितना अजीब है कि यदि हम किसी से प्यार करते हैं तो उसका शहर, उसकी गलियां, उससे जुडी हर चीज ही पसंद करने लगते हैं और जब अलग हो जाते हैं तो न वो शख्स वैसा लगता है न उससे जुड़ी कोई बात भली लगती है। हालाँकि मुझे कभी किसी के साथ अलग होने से कोई बुरा लगा नहीं। मेरी भावनाएं जैसी साथ रहते होती थ...

इन दिनों

इन तमाम उदासियों का सबब क्या होगा मुझे नहीं पता । इतनी उदासी, इतनी गहरी उदासी मैंने कभी महसूस नहीं की थी । खुद से इतनी चिढ़ होती है कि क्या बताऊँ । इतना बेजान, इतना बोझिल मैं खुद को कभी नहीं लगा । नींद नहीं आती, आती है तो ख़तम होने का नाम नही लेती है । दिन बिस्तर पर पड़े-पड़े सरक कर शाम तक पहुँच जाते हैं और शाम लुढ़क कर रात तक ।      मन किसी काम में नहीं लगता है । न पढ़ने न लिखने न गाना सुनने न घुमने की ही मर्ज़ी होती है । बस किसी तरह खुद को उठा कर बेमन से खाना बनाने के लिए तैयार कर लेता हूँ । खाना खाने का भी मन बस एक बार ही होता है दिन में । नहीं तो घंटों घंटों कई बार दो दो दिन तक बिना खाए रहा और पता भी नहीं चला कि मैंने खाना नहीं खाया है । कोई चीज़ है जो मुझे अंदर से खाए जाती है इन दिनों । इन दिनों जैसे घुन लग गया है मेरे मन में, जीवन में जो मुझे भीतर ही भीतर खाये जा रहा है । ये जो मैं लिख रहा हूँ पता नहीं कैसे और क्यों लिख रहा हूँ । अक्षर छपते से नज़र आ रहे हैं । लैपटॉप के की बोर्ड की आवाज मुझे सुनाई पड़ रही है ।  क्या ही करूँ मैं कुछ समझ नहीं आता । देखना है ये वक्त कब गुज़र...

नमस्कार भाई साब!

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अक्सर कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के चले जाने से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह सबसे बड़ा झूठ है। फर्क पड़ता है, पूरी दुनिया को भले न फर्क पड़े उसे तो ज़रूर फर्क पड़ता है  जिसके  लिए जाने वाला व्यक्ति दुनिया में बहुत कीमती होता है।   पिछले साल १६ अक्टूबर को मेरे ‘शत्रु मित्र ’ (ऐसा संबोधन वही करते थे मेरे लिए) श्री अमीरचंद जी इस दुनिया से विदा हुए थे। आज ये लिखते हुए भी मेरी आँख नम हो गयी है। इस साल उनकी पहली पुण्यतिथि है १६ अक्टूबर को उनके पैतृक निवास स्थान बलिया में। मेरी पूरी तैयारी और चाह थी वहां जाने की। आठ तारीख़ को मैंने टिकट कटा भी रखी थी मुंबई से आज़मगढ़ की। चूँकि दस तारीख को मुख्य राजस्व अधिकारी की अदालत में मेरी एक जमीन के मुक़दमे की तारीख भी थी। तैयारी यह थी कि दस को अपनी तारीख निपटा कर बनारस चला जाऊँगा और १४ को वहां से बलिया के लिए रवानगी और फिर १६ को कार्यक्रम के बाद कहीं घुमने निकल जाता। लेकिन अफ़सोस चाहा कभी होता ही नहीं मेरा। १५ को एक वेब सीरीज जो मैं लिख रहा हूँ उसकी नरेशन के लिए वड़ोदरा जाना पड़ेगा। मन दुखी हुआ लेकिन फिर अमीरचंद...

तुम्हारे बाद

इन दिनों तुम नहीं हो। इन्हीं दिनों में कभी तुम थी भी। मैं न होने को नहीं मानता, मैं जानता हूँ हो चुके को। जो हो चुका है अनहुआ नहीं हो सकता। जो नहीं हुआ है अनछुआ ही रहेगा। अनछुए की कोई स्मृति नहीं होती।  स्पर्श की होती है जैसे हुए की होती है।
कितना कुछ घटित हो रहा है हमारे सामने आज कल.. हम सब कहीं न कहीं इस घटने में शामिल होते हैं.. प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष ही... हम विकास कर रहे हैं किन्तु असंवेदनशील होकर? दया, त्याग, सहिष्णुता, संवेदनशीलता को ताक पर रख कर....