नमस्कार भाई साब!
१५ को एक वेब सीरीज जो मैं लिख रहा हूँ उसकी
नरेशन के लिए वड़ोदरा जाना पड़ेगा। मन दुखी हुआ लेकिन फिर अमीरचंद जी का ही
कहा याद आता है, “तुम अपना काम करो भाई, काम ही काम आएगा। बाकी कुछ ज़रूरी
नहीं है।” इस तरह मेरा अमीरचंद जी के पुण्यतिथि के कार्यक्रम में जाना
असंभव सा बन गया है।
मैं बात कर रहा था किसी व्यक्ति के दुनिया से
चले जाने या जीवन से अलग हो जाने का क्या फर्क पड़ता है?
अमीरचंद जी बहुत बड़ी हस्ती थे। उनके सामने बड़े से बड़े कलाकार को झुक कर
नमस्कार करते देखा था। बड़े से बड़े राजनेता जिसकी परछाई तक को छू पाना आम और
ख़ास आदमी के बस में नहीं होता वैसे राजनेता अमीरचंद जी का हाथ पकड़ कर घूमते नज़र
आते थे। इस दिसंबर में मैं जीवन के इकतीस साल पूरे कर लूँगा। जब से
होश संभालने लायक हुआ हूँ। इतना बड़ा आदमी मैंने नहीं देखा था। इतना ‘अपना’
आदमी नहीं देखा था। मैं अमीरचंद जी के सहारे इस बात की कल्पना कर सकता हूँ कि
नेहरु कितने उदार रहे होंगे। गाँधी कितने लोकप्रिय रहे होंगे! अमीरचंद जी
इतने अपने थे कि कभी खुद से अलग लगे ही नहीं। उनका मुझ पर बहुत स्नेह और
प्यार था यही कारण था कि मैं उनका मुंह लगा हो चूका था। उनसे भोजपुरी में
बतियाना, गुस्से में बहस के दौरान ऐसे शब्द बोल जाना जो सार्वजनिक रूप से किसी को
नहीं बोला जा सकता। लेकिन इन सब बातों को अमीरचंद जी नज़रंदाज़ कर देते थे और
हंस कर टाल देते या लाड़ से भोजपुरी में ही कहते, “तईं ढंग सीख बोले क” या बहुत
सोफेस्टिक होकर कहते “भाव सही हैं तुम्हारे लेकिन शब्द गलत हैं! ये ठीक बात नहीं
है। तुम लेखक हो यार। अच्छा नहीं लगता सड़क छाप आदमी की तरह बात करते
हो।”
मैं अब याद करता हूँ तो
लगता है मैं अपने को जितना लेखक नहीं समझता था अमीरचंद जी उससे ज्यादा समझते थे।
मेरा लिखा चाव से पढ़ते और उस पर फिर हम चर्चा भी करते। अमीरचंद जी के रहते
कभी लगा ही नहीं कि जीवन में कोई ऐसी समस्या आएगी जो सुलझा न ली जायेगी। अमीरचंद
जी मित्र नहीं मेरे संबल थे। एक ऐसा कंधा जिस पर बैठकर मैं दुनिया का मेला
देख लेता कभी, कभी उस
कंधे पर सर रख कर सिसक लेता। मेरी कोई बात अमीरचंद जी से न छिपी रहती।
ऐसी अंतरंगता जीवन में गिने चुने लोगों से ही बन पाई।
उनके जाने के बाद जीवन में एक अजीब सी रिक्तता की
अनुभूति होती है। समझ नहीं आता कि क्या ही होगा अब? लेकिन फिर उन्हीं को याद करता
हूँ जो मुझे उत्साहित किया करते थे, “तुम अपना काम करो जी।” जिस जगह
अमीरचंद जी ने मुझे रखा वह राज था। मैंने उनके राज में राजभोग भोगा है।
मेरी आत्मा तृप्त है उस आदमी से, उस आदमी के नाम से। एक अच्छे मित्र आपस
में मित्र नहीं प्रेमी होते हैं। मैं अमीरचंद जी से प्रेम करता था और
अमीरचंद जी मुझे दूना प्रेम करते थे। अमीरचंद जी को ईश्वर ने मन भर की
मुट्ठियाँ और कुंतल भर का कलेजा दिया था। उन्होंने जी भर के हीरे-मोती और
प्यार लुटाये अपने पहलु में आने वालों पर। अमीरचंद जी समुन्द्र थे, खारे
नहीं शहद से मीठे। अब दिल्ली वैसी दिल्ली नहीं लगती, है भी नहीं।
जैसी अमीरचंद जी के राज में थी। अमीरचंद जी के राज में उस घर में मैंने
नखरे करके घी खाए हैं और अब छाछ के लिए भी दुसरे का मुंह ताकना पड़ेगा। इसलिए
वहां जाने की इच्छा नहीं होती है।
मैं उस औरत की तरह महसूस करता हूँ जिसे उसके बहुत
प्यार करने वाले पति की मृत्यु पर कैसे सास, ससुर, देवर, जिठान ताने मारते हैं।
सताते हैं। लेकिन अपने पति की लाडली वह औरत तो अब भी किसी को कुछ नहीं
समझती। उसने देखा होता है अपनी पति का रुआब और ताव कि कैसे सब उसके आगे हाथ
फैलाए खड़े रहते थे। उसे मंजूर होगा ससुराल छोड़ देना लेकिन अपने पति का
अपमान वह तो नहीं सह पाएगी। पति के मरने के बाद सभी औरतें दूसरी शादी नहीं
करतीं या दूसरा आदमी नहीं रख लेतीं। विधवा होने के बाद भले मांग में सिंदूर
न पहनने का रिवाज हो लेकिन मन में उस औरत के उसका पति जीवित ही रहता है।
खिलखिलाता, ताव से ठसक के साथ।
अमीरचंद जी मेंरे मन में जीवित हैं, उसी ताव,
उसी ठसक और उसी सौम्य हंसी के साथ। कभी मेरी पीठ पर थपकी देते हुए।
कभी गले लगाते तो कभी आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराते हुए। अमीरचंद जी
मेरे लिए एक धरोहर की तरह हैं जिसे संरक्षित और प्रचारित प्रसारित करने का जीवन
में भरसक प्रयास करूँगा। आज जब उनके नाम से चिढ़ने वालों को देखता हूँ तो
बड़ी पीड़ा होती है मन में। लेकिन फिर अमीरचंद जी की ही कही एक बात याद आती
है, “छोड़ो जी, जिसकी
जितनी बुद्धि रहेगी वह वैसा काम करेगा।”
अंत
में अमीरचंद जी के लिए तहजीब हाफी का एक शेर याद आता है,
“अगर
तेरे नाम पर कभी जंग हो गयी तो, हम ऐसे बुझदिल भी पहली सफ में खड़े मिलेंगे।
नमस्कार
भाई साब!

हृदय निकाकर आपने रख दिया है।
ReplyDeleteभाई साब, वह हमारे हृदय में दिव्य पुंज की तरह प्रज्वलित रहेंगे।🙏🏻
Deleteकल्याण बाबू, एक एक शब्द पीड़ा से पंगा है, सच में कैसे चले गए भाई साब।
ReplyDeleteअनाथ कर के।
भईया, पता नहीं कब स्वीकारेगा ये मन इस क्रूर सच को। ये लिखते हुए भी आँख भर आई है। 😥
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