इन दिनों
इन तमाम उदासियों का सबब क्या होगा मुझे नहीं पता। इतनी उदासी, इतनी गहरी उदासी मैंने कभी महसूस नहीं की थी। खुद से इतनी चिढ़ होती है कि क्या बताऊँ। इतना बेजान, इतना बोझिल मैं खुद को कभी नहीं लगा। नींद नहीं आती, आती है तो ख़तम होने का नाम नही लेती है। दिन बिस्तर पर पड़े-पड़े सरक कर शाम तक पहुँच जाते हैं और शाम लुढ़क कर रात तक।
मन किसी काम में नहीं लगता है। न पढ़ने न लिखने न गाना सुनने न घुमने की ही मर्ज़ी होती है। बस किसी तरह खुद को उठा कर बेमन से खाना बनाने के लिए तैयार कर लेता हूँ। खाना खाने का भी मन बस एक बार ही होता है दिन में। नहीं तो घंटों घंटों कई बार दो दो दिन तक बिना खाए रहा और पता भी नहीं चला कि मैंने खाना नहीं खाया है। कोई चीज़ है जो मुझे अंदर से खाए जाती है इन दिनों। इन दिनों जैसे घुन लग गया है मेरे मन में, जीवन में जो मुझे भीतर ही भीतर खाये जा रहा है। ये जो मैं लिख रहा हूँ पता नहीं कैसे और क्यों लिख रहा हूँ। अक्षर छपते से नज़र आ रहे हैं। लैपटॉप के की बोर्ड की आवाज मुझे सुनाई पड़ रही है।
क्या ही करूँ मैं कुछ समझ नहीं आता। देखना है ये वक्त कब गुज़रेगा? मैं इसलिए भी यहाँ लिख रहा हूँ कि क्या पता शायद एक दिन ये उदासी मेरी ख़तम हो? क्या पता किसी दिन मैं हंस सकूं, कुछ लिख पढ़ सकूँ। या जी सकूँ!
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