अन्धविश्वास (लघु कथा)

 अन्धविश्वास (लघु कथा)

ट्रेन से सफ़र के दौरान मेरी ट्रेन तुम्हारे शहर में रुकी। रात के डेढ़ बज रहे थे। तुम्हारे शहर का तापमान एक डिग्री था उस दिन। मुझे तुम्हारे शहर में पहुँचने के डेढ़ सौ किमी पहले से ही उत्सुकता और बेचैनी होने लगी थी। आँख की नींद तुम्हारे शहर को जोह रही थी। मेरे अलावा डब्बे में कोई नहीं जाग रहा था। जाग रहे भी होंगे तो जागे जैसे नहीं थे। ट्रेन तुम्हारे शहर के प्लेटफार्म पर रुकी और चहल पहल भी एकदम नाम की थी। शाल, स्वेटर जैकेट में लिपटे बदन और मफलर, टोपियों से ढंके एक्का दुक्का चेहरे प्लेटफार्म पर टहलते दिखे। मेरी बोगी में से कोई नहीं लेकिन मेरी आगे की बोगी से कुछ लोग उतर कर बाहर निकले जरुर दिखे मुझे।
मैंने खिड़की से बाहर झाँक कर बोर्ड पर तुम्हारे शहर का नाम पढ़ा और आँख भर आई। ये कितना अजीब है कि यदि हम किसी से प्यार करते हैं तो उसका शहर, उसकी गलियां, उससे जुडी हर चीज ही पसंद करने लगते हैं और जब अलग हो जाते हैं तो न वो शख्स वैसा लगता है न उससे जुड़ी कोई बात भली लगती है। हालाँकि मुझे कभी किसी के साथ अलग होने से कोई बुरा लगा नहीं। मेरी भावनाएं जैसी साथ रहते होती थीं वैसी किसी से अलग होने पर ही रहीं।
मैं अपनी सीट से उतर कर डब्बे से बाहर निकलने के दौरान यही सोच रहा था कि यहाँ उतर जाऊं और बिना बताये कल तुमसे मिलूं। लेकिन हिम्मत नहीं हुई। मैं बेसिन के सामने आकर वहां टंगे आईने में अपनी शकल देखा। कसम से कह रहा हूँ मैं ही मुझे कितना बुरा लग रहा था।
तुम्हें याद करके मैं खुद को बुरा लगा, खुद को इतना बुरा मैं कभी लगा नहीं। मैँ कब से अपने लिए ही बुरा बन बैठा था पता चल गया। तुम्हारा शहर मेरे पसंदीदा शहरों में से एक है लेकिन उस पल बुरा लग रहा था, उस पल दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर भी मुझे बुरा लग सकता था क्योंकि मैँ खुद को बुरा लग रहा था। रात गाढ़ी थी, बोगी में यात्री सोए थे, सन्नाटा पहरा दे रहा था। उस सन्नाटे में मैं कुछ सोचता रहा, न जाने क्या!
मैं एकटक उस स्टेशन के बोर्ड को देखता रहा और पैर अनायास उस तरफ बढ़ गए। मैं अपने डिब्बे से उतरकर तुम्हारे शहर के स्टेशन के बोर्ड को छुआ। मुझे करंट जैसा लगा। लोहे का बोर्ड बर्फ की तरह ठंडा था। फिर मैंने उस बोर्ड को दुबारा छुआ ऐसे छुआ जैसे तुम्हारी कलाई थाम रहा हूँ।
मैं एकदम ब्लैंक था। वह सभी बातें याद आ रही थीं जो हमने आपस में की थीं कि तुम्हारे शहर में मैं आया तो हम वहां जायेंगे, वहां घूमेंगे, ये खायेंगे। वह सब मुझे उस बोर्ड पर किसी फिल्म की तरह चलता नज़र आ रहा था। अचानक ही ट्रेन ने हॉर्न बजाया। मन उदास हो गया। मैं फटाफट उस गलते बोर्ड पर से अपनी छुअन को मिटाने के लिए पूरी हथेली से पूरा जोर लगा कर पोछ डाला।
मन उदास हो गया। ये सोच कर कि वह आदमी ही नहीं रहा साथ तो क्या उसका शहर और क्या उसके शहर की सुन्दर जगहें। मुझे लगा कि बस जल्दी से ये शहर मेरे आंख के सामने से हट जाए। ट्रेन ने मेरी बात और दुःख जैसे समझ लिया। गाड़ी दुबारा हॉर्न बजा कर रेंगने लगी। मैं बहुत खुश हुआ। मैं अपने डब्बे में चढ़ गया और फिर मुड़कर अपनी आँख के सामने से गुज़रते प्लेटफार्म और तुम्हारे शहर को गुज़रता हुआ देख रहा था। सोच रहा था कि तुम भी तो ऐसे ही गुज़र चुकी हो।
फिर एकाएक मैंने अचानक ही तुम्हारा नाम लिया और प्लेटफार्म पर थूथकार दिया। मैंने कहीं सुना था कि किसी का नाम लेकर थूथकार देने से उसकी याद नहीं आती। आज तुम्हारा नाम लेकर थूथकार रहा हूँ और मेरा दिल कह रहा है कि ये अंधविश्वास है। गलत है। ऐसा कुछ होता नहीं है।
-कल्याण आर. गिरि

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