क्यूट लिट्टी चोखा की कहानी!
कुछ दिन पहले एक कैफ़े में जाना हुआ। बड़ा ही एथेनिक और कूल वाईब था। अंदर सफ़ेद रंग का ज्यादा इस्तेमाल था। मैं बहुत रेस्तरां में जाने वाला आदमी वैसे भी नहीं हूँ, मुझे देशी चीजें ही ज्यादा लुभाती हैं और घर का खाना ही ज्यादा पसंद करता हूँ।
मैंने मेनू देखा उसमें पास्ता, पिज़्ज़ा और इसके अलावा बहुत सी इसी टाइप्स की डिश थीं। मैं पहले उनके नाम पढ़ता और फिर उसके नीचे उनकी डिटेल्डिस कि उसमें क्या-क्या है? मैं क्या आर्डर करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर अचानक से मेरी नज़र लिट्टी-चोखा पर पड़ी। मुझे उस वक्त वैसी ही ख़ुशी मिली जैसी ख़ुशी मिली जैसी ख़ुशी मैडम क्युरी को रेडियम के अविष्कार करने पर हुई होगी।
मैंने बिना सोचे समझे लिट्टी चोखा बोल दिया लाने को। अब लिट्टी चोखा को लेकर मेरे मन में एक पारंपरिक इमेज ही बनी हुई है कि लिट्टी ऐसी होती है, खासकर के उसके आकार को लेकर। लिट्टी का एक मध्यम आकार ही कल्पना में होता है। हालाँकि एक बार बलिया में Ajit Singh भईया के गाँव में गोल नहीं लम्बे आकार में लिट्टी मिली तो वो भी अचरज लगा। उस आकार में लिट्टी उसके बाद कहीं भी नहीं देखा।
लिट्टी-चोखा असम, त्रिपुरा, कलकत्ता, दिल्ली, राजस्थान जैसे राज्यों में भी खाया हूँ और वहां पर भी गोल और मध्यम आकार की ही लिट्टी मिली जिससे मैं हमेशा से परिचित हूँ। किन्ही भी राज्यों में लिट्टी चोखा की दुकान लगाने वाले ज़्यादातर उत्तर प्रदेश या बिहार के लोग ही होते हैं इसलिए आकार में बदलाव नहीं होता है।
खैर, जब तक लिट्टी चोखा आया नहीं था तब तक मैं अपनी कल्पना में जैसे लिट्टी चोखा से परिचित था वैसी ही लिट्टी का इंतजार कर रहा था।
बेयरा प्लेट में लिट्टी चोखा लेकर आता दीखा तो मैं अपनी सीट से बैठे बैठे ही उसमें झाँक कर देखने की कोशिश किया लेकिन मुझे कुछ नज़र नहीं आया।
बेयरा जब मेरे एकदम पास आया तो मुझे दीखा ये लिट्टी चोखा जिसकी फ़ोटो आप देख रहे हैं।
पहले तो मैंने लिट्टी चोखा को देखा फिर बेयरे की शकल देख रहा हूँ। मुस्कुराना बेयरों के काम का एक अहम् हिस्सा है।
"यू कैन ऐड एक्स्ट्रा लिट्टी इफ यू वांट!" उसने कहा। उसे इस बात का ज़रूर अंदाज़ा रहा होगा कि लिट्माटी चोखा उत्तर भारत के लोग ही ज्यादा पसंद करते हैं और इतने छोटे लिट्टी से इनका काम नहीं बनेगा।
"ये लिट्टी थोड़ी, लिट्टी का बच्चा है।" मैंने कहा तो वो हंस पड़ा।
खैर, मैंने अपनी प्लेट पर नज़र गड़ाई और आँख भरकर इस सुंदर से सजीले लिट्टी चोखा को आँख भर के देखा। लिट्टी इतना क्यूट हो सकता है ये मेरी कल्पना में नहीं था। मैंने फिर बड़े प्यार डेलिगेट तरीके से लिट्टी को तोड़ा और पहला कौर मुंह में डाला!
वाह! शानदार! क्या ही अद्भुत स्वाद था। मज़ा ही आ गया।
मैं लिट्टी खाते समय वैसा ही अनुभव कर रहा था सिद्धार्थ को हुआ होगा जब उन्होंने सुजाता के हाथ से खीर खायी थी और फिर वो गौतम बुद्ध हो गए। लिट्टी खाते-खाते मुझे अपने ऊपर हंसी भी आ रही थी कि हम अपनी कल्पनाओं और किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति अपनी कायम राय के इतर कभी हट कर नहीं सोच पाते हैं।
मेरे मन में पारंपरिक लिट्टी चोखा की इमेज टूट चुकी थी। ये चार लिट्टी के बाद मैंने दो और लिट्टी अलग से मंगाया। मुझे सच में बहुत अच्छा लगा स्वाद। स्वाद के साथ-साथ एक बात भी सीखी कि किसी के प्रति एक राय कायम तो नहीं ही करके बैठ जाना चाहिए।
इसे कैफ़े का नाम है कैफ़े पिबाती! ओशिवरा में मीरा टॉवर के पास है बैक रोड की तरफ। आप लोग जाएँ और एक बार यहाँ के खानों का स्वाद लें। मज़ा आएगा।

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